Sunday, 8 April 2012

जोगिंग पार्क-3


नेहा वर्मा एवं शमीम बानो कुरेशी
फ़िर एक दिन मैं जब सवेरे विजय के यहाँ गई तो वहाँ उसका एक दोस्त और था। मैं उसे नहीं जानती थी... पर वो मुझे जानता था। उसने अपना नाम प्रफ़ुल्ल बताया था, पर लोग उसे लाला कहते थे। मुझे वहाँ रोज आता देख कर वो भी विजय के यहाँ आने लगा था। शायद वो मेरे कारण ही आता था। धीरे धीरे वो भी मेरे दिल को छूने लगा था लेकिन लाला के कारण हमारा खेल खराब हो चला था।
एक दिन शाम को विजय मेरे घर आ गया...
मेरे घर में एकांत देख कर उसने राय दी कि यहाँ मिलना अच्छा रहेगा। पर हमें जगह तो बदलनी ही थी, उसके घर के आस पास वाले अब हम दोनों के बारे में बातें बनाने लग गये थे।
अब हम दोनों मेरे ही घर पर मिलने लगे थे। पर मुझे लाला की कमी अखरने लग गई थी तो उसे मैंने पार्क में ही मिलने को कह दिया था। अब हम तीनों ही पार्क में जॉगिंग किया करते थे। मैं लाला से भी चुदना चाहती थी... मेरी दिली इच्छा थी कि दोनों मिल कर मुझे एक साथ चोदें।
यहाँ से अब लाला की कहानी भी शुरू होती है। मेरी फ़ुद्दी रह रह कर उसके नाम के टसुए बहा रही थी। वैसे भी जिसके साथ भी मेरी दोस्ती हो जाती थी, वो मुझे भाने लगता था और स्वयमेव ही चुदाने की इच्छा बलवती होने लगती थी।
मैं विजय की गोदी में बैठी हुई थी, एक दूसरे के अधरों को रह रह कर चूम रहे थे। विजय का लण्ड मेरी चूतड़ों की दरार में फ़ंसा हुआ था। मैं लाला को पटाने का माहौल बना रही थी। मैंने उसी को आधार बना कर वार्ता आरम्भ की।
"विजय कभी तुम्हारी इच्छा होती है कि दो दो लड़कियों को एक साथ बजाओ?" मैंने बड़े ही चालू तरीके से पूछा।
"सच बताऊँ, बुरा तो नहीं मानोगी... ? इच्छा किसकी नहीं होती एक साथ दो लड़कियों को चोदने की, मुझे भी लगता है दो दो लड़कियाँ मेरा लण्ड मसलें और मुझे निचोड़ कर रख दें... मेरा जम कर पानी निकाल दें..."
"आ... आ... बस बस... सच कहते हो... मेरी सहेली पूजा को पटाऊँ क्या? साली की चूत का भोंसड़ा बना देना !" उसे लालच देती हुई बोली।
"यह पूजा कौन है? उसे भी जोगिंग के लिये ले कर आओ... फिर तो पटा ही लेंगे दोनों मिल कर... फिर देखो कैसे उसकी पूजा करते हैं !"
"कितना मजा आयेगा, हम दोनों मिल कर तुमसे प्यार करेंगे और फिर तुम्हारा माल निकालेंगे... फिर देखो मुझे चूतिया बना कर गोल मत कर देना?"
"अच्छा ! तुम बताओ... तुम्हें अगर दो दो मस्त लण्ड मिल जायें तो... बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती हो..."
"हटो, मेरी ऐसी किस्मत कहाँ है... एक तो तुम ही बड़ी मुश्किल से मिले हो... दूसरा लौड़ा कहाँ से लाऊँ?" मैंने बड़ी मायूसी से कहा।
मैं तो लाला की बात कर रहा हूँ... उसकी नजर तो तुम पर है ही ! हो गये ना हम दो... " यह सुन कर मेरा मन खुशी से भर गया।
"अरे नहीं रे... मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहती हूँ...।" मैंने विजय को चूमते हुये उसे अपनी बातो में ले लिया और उसका लण्ड पकड़ कर हिलाने लगी।
"नेहा, तुम कोई मेरी बीवी तो हो नहीं, अगर तुम साथ में लाला से भी मजे ले लो तो मेरा क्या जाता है... बल्कि तुम्हें तो दो दो लौड़ों का मजा ही आयेगा ना?" वो मुझे समझाने लगा।
"सच विजय, यू आर सो लवली, सो स्वीट... मैं भी पूजा को ले आऊँगी... तुम उससे मजे लोगे तो सच में मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा।" पूजा मेरी नौकरानी थी, मैंने सोचा उसे जीन्स पहना कर कॉलेज गर्ल बना कर विजय से चुदवा दूंगी।
अब हम दोनों प्यार करते जा रहे थे और लाला को पटाने की योजना बनाने लगे।
सोच समझ कर हमने आखिर एक योजना बना ही डाली। इसमे विजय भी मेरी मदद करेगा। मेरा दिल खुशी के मारे उछलने लगा। लाला और विजय का लण्ड अब मुझे एक साथ मेरे जिस्म में घुसते हुये महसूस हुए। मैंने जोश में उसका लण्ड अपनी गाण्ड में घुसा लिया। उस दिन मैंने अपनी गाण्ड खोल कर विजय से मन से चुदाया।
मुझे चोद कर विजय चला गया। शाम को पूजा को मैंने विजय की बात बताई। पूजा बेचारी रोज छुप छुप कर मुझे चुदते देखती थी, वो सुन कर खुश हो गई। मैंने विजय को मोबाईल पर फ़ोन करके शाम को बुला लिया और उसे पूजा से मिलवा दिया।
"विजय यह मेरी खास सहेली है... इसे जरा मस्ती से चोदना... बेचारी बहुत दिनों से नहीं चुदी है...देखो, कहीं यह बदनाम ना हो जाये..."
"नेहा... यह मेरी भी खास बन कर ही रहेगी... पूजा आओ, बन्दा आपको आपको सिर्फ़ आनन्द ही आनन्द देगा।"
मैं उन दोनों को अपने बेडरूम में ले गई और कमरा बाहर से बन्द कर दिया। कुछ ही देर में अन्दर से सिसकियाँ और आहें भरने की उत्तेजनापूर्ण आवाजें आने लगी। मैंने अपनी चूत दबा ली और रस को अपने रूमाल से पोंछने लगी।
करीब आधे घण्टे के बाद उन्होंने बाहर आने के लिये दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोल दिया। पूजा की आँखें वासना से लाल थी, जुल्फ़ें उलझी हुई थी, जीन्स भी बेतरतीब सी थी, टॉप चूचियों पर से मसला हुआ साफ़ नजर आ रहा था, साफ़ लग रहा था कि उसकी मस्त चुदाई हुई है।
विजय भी मुस्कराता हुआ बाहर आया जैसे कि किसी कि कोई मैदान मार लिया हो। मैंने पूजा को चूम लिया।
"बेबी... मस्ती से चुदी है ना... तेरा चेहरा बता रहा है कि मजा आया है... अब तू जा... जब मन करे चुदने का तो विजय को बुला लेना !"
एक तीर से दो काम करने थे मुझे। विजय यूँ तो मुझे चोदता ही... मेरे पति के आने पर पूजा को मेरी जगह चोदता... तब मैं सुरक्षित रहती।
आज तो दिन को ही लाला विजय के यहाँ आ गया था। उसे पता था कि वो थोड़ी देर में मेरे घर जायेगा। मुझ तक पहुँचने के लिये उसे विजय की चमचागिरी तो करनी ही थी ना।
"लाला, भोसड़ी के ! एक बात बता... तुझे यह नेहा कैसी लगती है?" विजय अपनी लड़कों वाली भाषा का प्रयोग कर रहा था।
"जवानी की जलती हुई मिसाल है... मुझे तो बहुत प्यारी लगती है... चालू माल है क्या?"
"एक बात है यार... मुझे भी वो मस्त माल लगती है... तू कहे तो उसे पटायें..."
"कह तो ऐसे रहा है जैसे कोई लड्डू है जो खा जायेगा... दोस्त है, दोस्त ही रहने दे... कहीं दोस्ती भी हाथ से ना निकल जाये?"
"कब तक यार उसे देख देख कर मुठ मारेंगें ... कोशिश तो करें... अगर पट गई तो दोनों मिल कर साली को चोदेंगें।"
"चल मन्जूर है, देख अपन साथ ही चोदेंगे... देख विजय ... मुझे धोखा ना देना...यार देख मेरा तो लण्ड अभी से जोर मार रहा है।"
मुझे विजय का फोन आया कि लाला मुझे चोदने के लिये तड़प रहा है। मुझे अब लाला से चुदने की तैयारी करनी थी। मैंने पलंग को एक कोने में कर दिया और जमीन पर मोटा गद्दा डाल दिया। जमीन पर बिस्तर पर खुल कर चुदा जा सकता था।
जैसे ही बाहर दो मोटर साईकल रुकी, मेरा दिल धड़क उठा। मैंने बाहर झांक कर बाहर देखा। विजय और लाला ही थे। दोनों आपस में कुछ बाते कर रहे थे। तभी मेरे मोबाईल पर विजय का मिसकॉल आया। यह विजय का इशारा था। मेरा दिल अब जोर जोर से धड़कने लगा था। मुझे पसीना आने लगा था।
दोनों अन्दर आए तो मैं लाला को देख कर बोली- अरे तुम कैसे आ गए?
विजय बोला- मैं ले आया इसे अपने साथ ! तुझे चोदना चाहता है !
लाला कभी विजय को तो कभी मुझे देख रहा था हैरानी से कि विजय कैसे खुल्लमखुल्ला बोल रहा है।
लाला को इस तरह अपनी ओर देखते हुए विजय बोला- क्या देख रहा है बे? मैं तो इसे कई बार चोद चुका हूँ। और इसी साली ने तो मुझे कहा था कि दो लण्ड एक साथ लेना चाहती है तो मैं तुझे पट कर ले आया। तेरी नजर भी तो थी ही ना इस पर !
मैं शरमाते हुए बोली- विजय, क्या बकवास कर रहे हो?
मुझे नहीं पता था कि विजय इस तरह मेरी पोल खोल देगा।
लाला ने आगे बढ़ कर मुझे दबोच लिया।
"लाला... अरे... दूर हटो... क्या कर रह हो?" पर सच कहूँ तो मुझे स्वयं ही इसकी इच्छा हो रही थी।
"तेरी माँ दी फ़ुद्दी... ऐसी मस्त गाण्ड और चूत कहां मिलेगी !" लाला जैसे अपना आपा खो चुका था। उसके अंग अंग फ़ड़क उठे। मेरे स्तन उसने मसल दिये। उसने मुझे अपनी बाहो में उठा कर नीचे गद्दे पर पटक दिया, मेरे ऊपर आकर मुझे दबा लिया, उसके शरीर का दबाव मुझे बड़ा मोहक लगा।
"साली की मस्त चूत चोद डालूँगा !" वो बड़ी कुटिलता से मुस्करा कर अपनी पैन्ट खोल रहा था जैसे मैदान मार लिया हो।
इतने में विजय को पुकारते हुए मैं बेशरमी से बोली- विजय, मुझे बचा लो... देखा लाला मुझे चोदने पर तुला है...
लाला मेरी मैंने विजय को आँख मारी। विजय ने मेरी मैक्सी उठाते हुए मेरे गले से निकाल कर फ़ेंक दी। अन्दर मैंने कुछ पहना ही नहीं था तो मैं अब मादरजात नंगी हो गई थी।
"साली को छोड़ूंगा नहीं... मां कसम चिकनी है... चूत मारने में बहुत मजा आयेगा।"वो वासना में जैसे उबल रहा था।
मैं अभी भी नखरे दिखाने को मचल रही थी जैसे उससे छूटना चाह रही हूँ। तभी विजय ने मेरी टांगे पकड़ ली और दोनों ओर खींच कर मेरी चूत भी खोल दी। मैंने भी चूत अपनी फ़ाड़ कर खोलने में सहायता की।
"विजय तुम भी... हाय अब क्या करूँ... लगता है मेरी फ़ुद्दी की मां चोद देंगे।"
"विजय बोला- भोसड़ी की मस्त माल है , जरा जम के चोद डाल इसे... फिर मैं भी इसकी चोदूँगा।
"थेंक्स विजय... मेरे दोस्त... मुझे नेहा जैसा मस्त माल को चोदने में मेरी मदद की... भेन दी लण्ड !"
तभी लाला का फ़ौलादी लण्ड मेरी चूत में घुस पड़ा। मेरे मुख से आह्ह निकल गई। मैंने धीरे से विजय को आंख मार दी।
"लाला। मर गई ... हाय राम... ये क्या किया तूने... अब तो छोड़ दे... घुसेड़ दिया रे !" और मैंने लाला की बाहे अब जकड़ लिया। मस्ती से मेरे दांत भिंच गये।
विजय ने भी अपने कपड़े उतार लिये और लण्ड मेरे मुख के समीप ले आया,"चल चूस ले मां की लौड़ी ... जरा कस कर चूसना... निकाल दे मेरा माल ..."
"दोनों साले हरामी हो... देखना भेन चोदो... तेरे लण्ड का भी पानी ना निकाल दूं तो कहना !" मेरे मुख से भी जोश में निकल पड़ा।
"यह बात हुई ना... मादर चोद ... रण्डी... छिनाल साली... तेरी तो आज फ़ोड़ के रख देंगे।" उसकी गालियाँ मेरी उत्तेजना बढ़ा रही थी। मुझे किसी ने आज तक ऐसी मीठी मीठी... रसभरी गालियाँ देकर नहीं चोदा था। विजय का मस्त लण्ड मेरे मुखद्वार में प्रवेश कर चुका था। आज मेरे दिल की यह इच्छा भी पूरी हो रही थी- दो दो जवान चिकने लौंड़ो से लण्ड लेने की इच्छा...।
किसकी किस्मत में होता है भला दो दो लण्ड से एक साथ चुदाना। मुझे पता था कि अब मेरी आगे और पीछे से जोरदार चुदाई वाली है। लाला का लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ गहराई में बैठता जा रहा था। मेरी सिसकियाँ निकल रही थी। दुसरी और विजय का लण्ड मुख को चोदने जैसा चल रहा था। मैंने विजय को बेकरारी में आँख मारी... वो समझ गया।
"लाला, इस मां की लौड़ी को अपने ऊपर ले ले... मैं भी जरा प्यारी सी नेहा की गाण्ड बजा कर देखूँ !" मैं विजय की बात पर मुस्करा उठी। लाला ने मुझे दबा कर पलटी मार दी और मै उसके ऊपर आ गई... मैंने लाला के लण्ड पर जोर मार कर फिर से उसे चूत में पूरा घुसा लिया और अपने चूतड़ खोल दिये। मेरा शरीर सनसना उठा कि अब मेरी गाण्ड भी चूत के साथ साथ चुदने वाली है।
तभी मेरी चिकनी गाण्ड में विजय का लौड़ा टकराया। मैं लाला से लिपट पड़ी।
"लाला देख ना विजय ने अपना लौड़ा मेरी गाण्ड में लगा दिया है... क्या यह मेरी गाण्ड मारेगा?"
"देखती जाओ, मेरी छम्मक छल्लो ... हम दोनों मिल कर तेरी क्या क्या मारते हैं... भोसड़ी की... चूतिया समझ रखा है? क्या तू बच जायेगी... साली को फोड़ के नहीं रख देंगे।"
"अरे जा... बड़ा आया चोदने वाला... हरामी का लण्ड तो खड़ा होता नहीं है... बाते बड़ी बड़ी करता है।"
"विजय... गण्डमरी को छोड़ना नहीं... दे साली की गाण्ड में लौड़ा..." विजय तो जानता था कि मैं जोरदार चुदाई चाहती हूं, इसलिये मैं लाला को भड़का रही हूँ।
विजय का लण्ड भी मेरी गाण्ड में घुसता चला जा रहा था। आह्ह्ह्...... मस्त दो दो लण्ड... कैसा अद्भुत मजा दे रहे थे। मुझे आज पता चला कि चूत और गाण्ड के द्वार एकसाथ कैसे खुलते है और लण्ड झेलने में कितना मजा आता है। मेरी अन्तर्वासना की सखियो ... मौका मिले तो जरूर से दो दो लण्डों का आनन्द लेना।
आह्ह्ह रे दोनों लण्ड का अहसास... मोटे मोटे अन्दर घुसते हुये ... मां री ... मेरा जिस्म आनन्द से भर गया। पूरे शरीर में मीठी सी लहर उठने लगी। मेरे कसे हुये और झूलते हुये स्तन विजय ने पीछे से थाम लिये और दबा लिये।
मेरी स्थिति यह थी कि मैं अपने चूतड़ दोनों ओर से दबे होने कारण उछाल नहीं पा रही थी। अन्ततः मैं शान्ति से लाला पर बिछ गई और बस दोनों ओर से लण्ड खाने का आनन्द लेने लगी। कैसा अनोखा समा था। दोनों के लण्ड टनटना रहे थे...फ़काफ़क चल रहे थे... मैं दोनों के मध्य असीम खुशी बटोर रही थी। मन कर रहा था कि ऐसी मस्त चुदाई रोज हो। हाय रे... मेरी चूत और गाण्ड दोनों ही चुद रही थी ... ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि काश यह लम्हा कभी भी खत्म ना हो बस जिन्दगी भर चुदती ही रहूँ।
तभी विजय के मुख से कराह निकली और उसका वीर्य गाण्ड की कसावट के कारण रगड़ से निकल पड़ा। उसने अपना लण्ड बाहर निकाला और बाकी बचा हुआ वीर्य लण्ड मसल मसल कर निकालने लगा। तभी दोनों ओर की चुदाई के कारण मैं अतिउत्तेजना का शिकार हो गई और मेरा रज भी छूट गया। मैं झड़ने लगी थी। कुछ ही पल में लाला भी झड़ गया। मेरी चूत के आस पास जैसे लसलसापन फ़ैल गया, नीचे गंगा जमुना बह निकली। मैं लाला के ऊपर पड़ी हुई थी। विजय उठ कर खड़ा हो गया था और मेरे चूतड़ों को थपथपा रहा था।
कुछ ही समय के बाद हम अपने कपड़े पहन कर सोफ़े पर बैठे हुये चाय पी रहे थे।
लाला आज बहुत खुश था कि आज उसे मुझे चोदा था। ये कार्यक्रम मेरा मस्ती से छः महीनो तक चलता रहा। पूजा अब लाला से भी चुदवाने लगी थी। तभी कनाडा से सूचना आई कि मेरे पति दो दिन बाद घर पहुंच रहे हैं।
मैंने विजय और लाला को इस बारे में बताया कि अब ये सब बन्द करते है और मौका मिलने पर फिर से ये रंग भरी महफ़िल जमायेंगे। पर हां जोगिन्ग पार्क मे हम नियम से रोज मिलेंगे। पूजा दोनों के लण्ड शान्त करती रहेगी। वो उदास तो जरूर हुये पर पूजा ही अब उनका एक सहारा था। पूजा भी बहुत खुश नजर आ रही थी कि अब उसकी चुदाई भरपूर होगी...
आपकी
नेहा और शमीम बानो कुरेशी

पम्मी जी पप्पू जी


आप सभी अन्तर्वासना के पाठकों को मेरा प्यार भरा नमस्कार !
आपने मेरी पहली कहानी
को काफी सराहा, मुझे कई सारे मेल मिले जिनमें से कई लड़कों और लड़कियों ने मुझसे उस औरत के नंबर मांगे तो मैं उन्हें यह बताना चाहूँगा कि हम कॉल बॉय कभी भी किसी ग्राहक का नंबर किसी को नहीं देते क्योंकि यह उनकी निजता का प्रश्न है।
दोस्तो, मैं चूत को पम्मी जी बोलता हूँ, लण्ड को पप्पूजी और गाण्ड को तरबूज, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है किसी को शक भी नहीं होता है इन शब्दों से।
अब कहानी पर आते हैं !
यह बात उस समय की है जब मैं बारहवीं में पढ़ता था, मेरे ही पड़ोस में रहने वाली आंटी मुझे बहुत अच्छी लगती थी और लगती भी क्यों नहीं, वो थी ही ऐसी जबरदस्त कि अगर बुड्ढा भी उसे देखे तो उसका लण्ड तो क्या लण्ड के बाल भी कड़क हो जायें !
मैं रोजाना उन्हें छत से देखा करता था किताब लेकर ताकि किसी को शक न हो कि मैं उन्हें देख रहा हूँ, सभी को यही लगता कि मैं पढ़ाई कर रहा हूँ।उन्हें भी पता था कि मैं छुप-छुप कर रोजाना उन्हें देखता हूँ ! उनके पति शराब बहुत ज्यादा पीते थे और जल्दी ही सो जाते थे, फिर वो देर रात तक घर के आंगन में बैठी काम करती रहती थी। मैं उनसे कम ही बात करता था।
वो जब भी नहा कर बहार आती थी तो उनके शरीर पर सिर्फ एक तौलिया ही होता था और बाल खुले रहते थे जो उनके वक्ष को ढके रखते थे। फिर जब वो आँगन में बैठ कर अपने बाल संवारती तो गजब लगती थी।
ऐसे ही एक दिन मैं बाज़ार किसी काम से गया हुआ था, जब वापिस आया तो मम्मी ने कहा कि पास वाली आंटी आई थी, तुम्हें बुलाया है, उनके घर पर कोई नहीं है, उनके पति आज 6-7 दिनों के लिए ऑफिस के काम से बाहर जा रहे हैं तो तुम्हें उन्हीं के साथ रहना है कुछ दिन, और अपनी किताबें भी ले जाना ताकि वहाँ पढ़ाई कर सको !
मैंने कहा- ठीक है !
और मैं अपना स्कूल बैग लेकर उनके घर चला गया। काफी देर तक दरवाजा बजने पर भी अन्दर से कोई जवाब नहीं आया तो मैंने दरवाजे को जोर से धकेला तो वो खुल गया। मैंने पूरा घर देखा लेकिन वो कहीं नहीं दिखी तो मैंने सीचा कि शायद वो नहा रही हों।
जब बाथरूम के पास गया तो पता चला कि वो नहा ही रही हैं और दरवाजा भी बंद नहीं किया है। मैं छुप कर उन्हें देखता रहा, उनकी पीठ दरवाजे की तरफ थी तो मैं खुले दरवाजे से उन्हें देखता रहा उनकी गोल गोल तरबूज देख कर मेरा लण्ड कड़क हो गया।
तभी अचानक वो पलट गई लेकिन उनके मुँह पर साबुन लगा होने से मुझे नहीं देखा उनकी आँख में साबुन चला गया था, टंकी में पानी भी ख़त्म हो गया था तो वो बंद आँखों से डब्बे को ढूंढ़ रही थी लेकिन वो बाहर रखा हुआ था।
मैंने उन पर तरस खाकर डब्बा उनके हाथ में दे दिया।
डब्बा ले कर वो पलटी और बाल्टी से पानी डालने लगी अपने आँख पर ताकि साबुन निकल जाये। तभी उन्हें लगा कि डब्बा तो बाहर था फिर मुझे दिया किसने?
वो एकदम से पलटी तो सामने मैं खड़ा था।
वो जोर से चिल्लाई तो मैं डर कर कमरे में जाकर बैठ गया। फिर नहा कर वो कमरे में आई तो उनके शरीर पर सिर्फ तौलिया ही लपेटा हुआ था। आते ही उन्होंने मुझे डांटना शुरू कर दिया, मैं सर नीचे झुकाए चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।
तभी उनका तौलिया खुल गया जिसे मैंने फ़ौरन पकड़ लिया तो वो बोली- यह क्या कर रहे हो? तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी आंटी के साथ ऐसा करते हुए? मैं तुम्हारी मम्मी को बोलूँगी।
तभी मैंने उनके होंटों पर अपने हाथ रख दिए और कहा- आपका तौलिया खुल गया था जिसे अभी भी मैंने ही पकड़ा है।
तो वो गुस्से से बोली- छोड़ो तौलिये को !
मैंने कहा- लेकिन यह खुल जायेगा !
तो वो बोली- मुझे कुछ नहीं सुनना है, तुम छोड़ो इसे फ़ौरन !
मैंने डर के मारे छोड़ दिया और गर्दन नीचे कर ली तो तौलिया नीचे गिरते ही उनकी बिना बालों वाली गोरी सी प्यारी सी पम्मी जी के दीदार हो गए।
मैं एकटक उनकी पम्मीजी को निहारता ही रहा और वो मुझे डांटे जा रही थी। मैंने उन्हें कहा- आप कपड़े तो पहन लो, उसके बाद जो करना है वो कर लेना !
तब वो समझी कि वो मेरे सामने बिल्कुल नंगी खड़ी हैं, वो शरमाई और तौलिया लपेट कर दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई ! मैंने मौके का फायदा उठाया और अपने सारे कपड़े खोल कर उनके पास जा कर उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा- आप घबराइए मत ! मैं किसी को भी यह बात नहीं कहूँगा कि आप मेरे सामने नंगी खड़ी थी और मुझे डांट रही थी और मैं चुपचाप आपकी पम्मीजी को देख रहा था !
तो वो और ज्यादा शरमा गई।
मैंने उन्हें अपनी ओर पलटाया और उनके हाथ ऊपर कर दिए और धीरे से उनके तौलिए पर हाथ रख दिया या यह कहो कि मैंने उनके चूचों पर हाथ रख दिया।
तभी उन्होंने अपने हाथ नीचे किये और अपनी आँखें खोली और उन्होंने मुझे धक्का दे दिया। मैं नीचे गिर गया !
तभी वो बोली- मेरी चूत चोदेगा? मेरी गाण्ड मारेगा तू? तेरी इतनी औकात कि तू मेरे साथ चुदाई करेगा? अबे तेरा है ही कितना अभी जो तू मेरी चूत की प्यास दूर कर सकेगा? दिखा तो सही मादरचोद तेरा 2-3 इंच का लण्ड भोसड़ी के?
तो मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उन्हें अपना पप्पू हाथ में ले कर दिखा दिया कि यह लो देख लो जी भर के !
तो वो नाटक करते हुए बोली- बस इतना सा? मेरे पति का तो तुझसे बहुत बड़ा है !
तो मैंने उन्हें कहा- वो मुझसे उम्र में भी तो बड़े हैं तो जाहिर सी बात है बड़ा तो होगा ही !
लेकिन उनकी नजरें मेरे पप्पू से हट ही नहीं रही थी, ललचाई हुई नजरों से मेरे पप्पू को देख रही थी।
मैं समझ गया कि इसे मेरे पप्पू को अपनी पम्मी में लेने का मन कर रहा है।
फिर मैंने सोचा कि जो भी होगा देखा जायेगा, आज तो कबड्डी खेल ले !
मैं उनके पास तो था ही, फ़ौरन से उनके दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके बूबे चूसने लगा। उन्होंने मुझसे जानबूझ कर छुटने की कोशिश नहीं की लेकिन फिर भी वो कसमसा रही थी।
मैंने उनके हाथ छोड़ दिए थे धीरे से मैं उनके तरबूज पर हाथ फेरने लगा।
अचानक से मैंने उनके तरबूज के बीच वाले छेद में अपनी अंगुली थूक लगा कर घुसेड़ दी तो वो एकदम से चिहुंक उठी लेकिन मैंने उन्हें ऐसा करने से मना किया।
थोड़ी ही देर में उन्होंने मेरा पप्पू अपने हाथ में ले लिया और प्यार से उसे मसलने लगी।
मुझे अच्छा लग रहा था, मैंने उन्हें घुटनों के बल बैठने को कहा और अपनी बेल्ट हाथ में ले ली जैसे ही वो नीचे बैठी, मैंने उनके दोनों हाथ पीछे ले जाकर बेल्ट से बांध दिए और उनका मुँह पकड़ कर खोल दिया ताकि मैं अपना पप्पू डाल सकूँ।
मैं ठंडा होने वाला था, वो कसमसाती ही रह गई और मैंने अपना सारा रस-मलाई उनके मुँह में डाल दिया।
वो मुस्कुराते हुए बोली- तुम बहुत ख़राब हो ! मेरे हाथ खोलो वरना मैं चिल्लाऊँगी।
मैंने कहा- ठीक है, चिल्लाओ ! जब कोई आ जायेगा तब क्या कहोगी कि मैंने क्या किया है?
वो कुछ सोचने लगी और कहा- अब मेहरबानी करके मेरे हाथ खोल दो, मैं भी वही सब चाहती हूँ जो तुम चाहते हो।
तब मैंने उसके हाथ खोल दिए और उसे अपना पप्पू मुँह में लेने को कहा ताकि वो फिर से तैयार हो जाये चुदाई के लिए !
वो धीरे धीरे से मेरा चूसने लगी, मैं उन्हें पलंग पर ले गया, उनकी पम्मी को चूसने लगा। वो मेरा पहले से ही चूस रही थी, मैंने अपना पप्पू उनके मुँह से हटा लिया और सिर्फ उनकी पम्मीजी को बेइंतहा प्यार करने लगा, यानि की चाटता रहा और वो सिसकारियाँ ले रही थी, उनके मुँह से सीईईई उफ्फ्फ्फ़ आःह्ह की आवाजें आने लगी।
मैं समझ गया कि अब इन्हें मेरा पप्पू चाहिए तो मैं उनसे पूछने ही वाला था कि उन्होंने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मेरे होंठ चूसने लग गई।
उन्होंने अपने एक हाथ से मेरा पप्पू अपने पम्मी के ऊपर रख दिया और मेरे तरबूज के बीच में अपनी अंगुली डाल दी। मैं एकदम से चिंहुका और मेरा पप्पू उनकी पम्मी के अन्दर घुस गया।
तभी उन्होंने एक ठंडी साँस ली और बोली- मुझे चोद दिया? जितना चोद सकते हो, चोद डालो मुझे ! आज मैं आज बहुत ज्यादा मजा लेना चाहती हूँ !
मैंने उन्हें कहा- अगर ज्यादा मजा लेना है तो पीछे करवा लो ! चूत से भी ज्यादा मजा आएगा आपको !
वो बोली- पीछे का छेद तो बहुत छोटा होता है, कैसे घुसेगा उसमें?
मैंने कहा- वो सब मुझे पर छोड़ो, मैं सब कुछ कर लूंगा, आपको पता भी नहीं चलेगा ! कोई ज्यादा तकलीफ़ नहीं होने दूँगा।वैसे पाठको, उनके पति का पप्पू मुझसे छोटा था मोटाई में बराबर ही था। उसने कहा- नहीं बाबा नहीं ! मैं तो मर जाऊँगी, मेरे पीछे मत डालना, आज तक मैंने उनसे भी नहीं डलवाया है।
तब मैंने उन्हें कहा- जब मेरा उनसे छोटा है, दुबला पतला है तो फिर क्यों डरती हो? पहली बार तो सभी के दर्द होता ही है, आपकी पहली चुदाई पर क्या आपको दर्द नहीं हुआ था और बच्चा पैदा करते हैं तब भी तो दर्द होता ही है, कम से कम उस दर्द से तो बहुत कम दर्द होगा आपको !
मैंने उनकी अलमारी से पोंड्स क्रीम निकाली और उनकी गाण्ड में अपनी अंगुली से डालता रहा और ढेर सारी अपने पप्पू पर भी लगा ली।
वो उलटी ही लेटी थी और मैंने अंगुली डालते डालते अपना पप्पू उनकी गाण्ड में डाल दिया एक झटके से !
वो चिल्ला रही थी तो मैंने उनका मुँह जोर से बंद कर दिया और दूसरा झटका भी दे डाला ताकि दूसरी बार उन्हें दर्द न हो।
उनकी आँखों में आंसू आ गए और मैं उनके ऊपर ही लेटा रहा। फिर जब वो चुप हो गई तब मैंने उनसे पूछा- क्या अब भी दर्द हो रहा है?
तो वो बोली- थोड़ा-थोड़ा हो रहा है।
मैं उन्हें घोड़ी की अवस्था में ले आया और अपना काम शुरु कर दिया यानि की गाण्ड चुदाई, अपने एक हाथ से उनके पम्मी की नाक मसल रहा था और दूसरे हाथ से उनके बोबे !
10 मिनट में में उनकी गाण्ड में ही ठंडा हो गया।
फिर वो सीधी हो गई, बोली- मेरी चूत की आग को कौन ठंडा करेगा अब?
मैंने कहा- मेरे शेर को फ़िर से तैयार करो, फिर देखना कि कैसा बैंड बजाता है मेरा शेर !
तब उसने कहा- ठीक है, देखती हूँ ! अगर आज तूने मेरी आग बुझा दी तो मैं जिन्दगी भर के लिए तेरी गुलाम बन जाऊँगी, जब तू कहेगा तब तुझसे करवाऊँगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं तेरी गाण्ड में मेरा प्लास्टिक का लण्ड डाल दूंगी ! बोल मंजूर है तुझे?
मुझे तो पहले से ही मालूम था कि जब में दो बार ठंडा हो चुका हूँ तो तीसरी बार तो उसकी पम्मी का बैंड बजना ही है।
तो मैंने हाँ कर दी यानि उनकी शर्त को मंजूर कर लिया।
अब मैं उनकी पम्मी को चूसने लगा ताकि वो बहुत ज्यादा गर्म हो जाये, थोड़ी ही देर में वो अपनी गाण्ड यानि तरबूज उचकाने लगी। मैं समझ गया कि अब इसकी तो गई काम से !
फिर मैंने अपना पप्पू शेर लण्ड महाराज उनकी पम्मी में डाल दिया तो वो बोली- दम नहीं है क्या?
मैंने कहा- दम तो बहुत है लेकिन तुम्हारे में ताकत नहीं है, अगेर है तो तुम कर के बता दो।
तो उसने एकदम से मुझे धक्का दिया और पलंग पर गिरा दिया, फिर मेरे ऊपर चढ़ कर अपनी पम्मी में मेरा पप्पू डलवा कर उछलने लगी। आखिर कब तक उछलती, आखिर में उनकी वो घड़ी आ ही गई जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था और वो चिल्लाती हुई मेरे ऊपर ही गिर गई।
तब मैंने कहा- क्या हुआ मैडम जी? थक गई?
तो उन्होंने हाँ भरी और पलंग पर सीधी लेट गई।
तब मैं तुरंत उनके ऊपर चढ़ गया और शुरु कर दी चुदाई।
वो बोली- क्या कर रहे हो? मेरा तो हो चुका है !
तब मैंने कहा- मैडम, मेरा शेर लम्बी रेस का घोड़ा है, इतनी जल्दी नहीं थकता है, अभी तो आपको एक बार और ठंडा होना है।
थोड़ी ही देर में वो बड़बड़ाने लगी- भोसड़ी के चोद ना ! और जोर से चोद ! मादरचोद फाड़ डाल आज इसको ! साली कुत्ती रांड बहुत ज्यादा फड़कती है यह ! आज फाड़ डाल इसको ताकि कभी उस चूतिये का 6 इंची लेने का मन ही न करे !
मेरा छुटने को था तो मैंने उनसे कहा- बोलो, अन्दर ही डाल दूँ अपना रस?तो वो बोली- अन्दर ही डाल दो ! उस गरमा गरम रस को मैं अपने अन्दर लेना चाहती हूँ और तुम्हारे बच्चे की माँ बनाना चाहती हूँ ! बोलो बनाओगे न मुझे अपनी बाहर वाली बीवी ? बोलो?
तब मैंने हाँ भर दी और अपना सारा रस उसकी पम्मी में डाल दिया।
फिर थोड़ी ही देर में कहा- अब रोजाना तुम मुझसे वो सब कुछ करवाओगी जो मैं चाहूँगा?
तो उसने हामी भर दी। फिर जब भी उनके पति बाहर जाते तो वो मेरी मम्मी को बोल कर मुझे अपने घर पर रात को सोने के लिए बुला लेती और मैं उनके घर पर चला जाता था और उनकी जम कर चुदाई करता !
आज हम दोनों के एक बेटा है जो सात साल का हो गया है। मेरे पापा का ट्रांसफर हो गया था तो हम सभी पापा के साथ उनकी नई पोस्टिंग वाली जगह पर चले गए थे। अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने उनके पति को अपने शहर में देखा था उनकी अपनी ही बाइक पर ! शायद वो लोग भी इसी शहर में आ गए हैं। अब मैं उन्हें ढूंढ़ रहा हूँ ताकि हम दोनों अपनी सेक्स की दास्ताँ आगे बढ़ा सकें।
तो दोस्तो, यह थी मेरी पहली सबसे प्यारी चुदाई की कहानी !
आपको कैसी लगी, इस बारे में आप मुझे अपनी अपनी राय मेल कर सकते हैं।
loveguru4u000@gmail.com

आकर्षण-5


लेखिका : वृंदा
वेदांत मेरे पास आया.. उसने मुझे गले लगा लिया.. उसकी तरफ देख कर बोला... : दोस्त है यह मेरी, प्यार करता हूँ इससे.. हाथ तो क्या आँख भी उठाई ना.. तो उस दिन के बाद किसी और को नहीं देख पायेगा तू...!!!
मेरी आँखें भर आई थी... पर साथ साथ होंठों पर मुस्कान भी थी.. अजीब सा लग रहा था.. रो रही थी या हंस रही थी पता नहीं... मैं उसे बाहर ले आई.. अनिरुद्ध के घर वालों को फोन करके इत्तिला दी.. कि अनिरुद्ध का एक्सिडेंट हो गया है...
अनिरुद्ध के हाथ पाँव टूट चुके थे उस दिन के बाद तीन महीने तक वो कॉलेज़ नहीं आया...!!!
अब मेरे और वेदांत के रिश्ते में भी स्पष्टता आ गई... आखिर उसने अपने प्यार का इज़हार जो कर दिया था..
मुझे अब लगने लगा था जैसे मेरी मांगी मुराद पूरी हो गई.. मेरा एक तरफ़ा आकर्षण अब प्रेम का रूप ले जग जाहिर होने लगा था.. होंठों की मुस्कान रोके नहीं रूकती थी.. चेहरे पर असीमित शान्ति.. क्रोध राग द्वेष से कोसों दूर हो चुकी थी, सब कुछ अच्छा-अच्छा लगने लगा था.. पूरी दुनिया हसीं हो गई थी..
पर इन सब ख्वाबों में खोई मैं वेदांत को भी पल पल अपने से दूर कर रही थी.. मेरे अपने एक तरफ़ी प्रेम के बहाव में बहने से .. हम दोनों में वार्तालाप अब कम होने लगी.. घंटों तक उसे देखते रहना.. उसके ख्यालों में खोये रहना.. सोचते रहना.. कुछ भी न कहना .. खुद से बातें करना.. हमारे बीच आने लगा था.. मैं न चाहते हुए भी उससे दूर होने लगी थी... मेरा यह आकर्षण हमारी दोस्ती को दीमक की तरह चाट रहा था...
एक दिन ...
मेरा जन्मदिन था.. उसने मुझे स्कूल में विश भी नहीं किया.. कोई उपहार नहीं, कोई फूल भी नहीं.. मेरी तरफ देखा तक नहीं.. बात भी नहीं की उस खडूस ने..
बड़े ही बेमाने दिल से मैं स्कूल से आने के बाद सोने चली गई, मम्मी ने बाहर जाकर जन्मदिन मनाने के लिए भी कहा.. पर मेरा बिल्कुल मन नहीं था, मेरी ज़िन्दगी के सबसे महतवपूर्ण इंसान को कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था कि मैं हूँ या नहीं.. उसके इज़हार के बाद उसका इतना रूखापन मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था... आँखों में आंसू भरे मैंने उसे एस.एम.एस. किया... "शायद आज तुम कुछ भूल गए... शायद आज हमारे बीच इतनी दूरियाँ आ गई हैं कि एक दूसरे की जिंदगी में क्या चल रहा है.. इस बात से तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता... तुम मेरे पहले और आखिरी दोस्त हो ! - वृंदा "
उसके जवाब के इंतज़ार में मैं कब रोते रोते सो गई मुझे पता ही नहीं चला...
रात के बारह बजे, तकिये के नीचे पड़े फोन से घू घू घू घू की आवाज़ आई.. अध्खुली, नींद भरी आँखों से मैंने फोन देखा.. लिखा था वन अनरेड मैसेज..
मैंने मैसेज पढ़ा... लिखा था,"मुझे माफ़ कर दो ! आज मैंने पूरा दिन तुमसे बात नहीं की... मैंने जानबूझ कर ऐसा किया, मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मदिन पर एक तोहफा देना चाहता था.. जिसे मैं सिर्फ हम दोनों के बीच ही रखना चाहता था.. अपनी बेरुखी के लिए माफ़ी चाहता हूँ.. वादा करता हूँ कि आज के बाद ऐसा नहीं करूँगा.. तुम्हारा तोहफा लिए मैं नीचे तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ.. जल्दी से आ आकर ले लो, वरना मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा...!!!"
इतना पढ़ते पढ़ते ही मेरी आँखों की नींद उड़ चुकी थी.. दिल जोरो से धक् धक् करने लगा था.. जाने क्या लाया होगा वो.. एक बड़ा सा टैडी बीयर, या फिर ग्रीटिंग कार्ड.. या चोकलेट...मेरे पेट में कुलबुलाहट सी होने लगी..
मैं अपनी छोटी सी निक्कर और टीशर्ट में ही नंगे पावों सीढ़ी से नीचे उतर कर दरवाज़े तक गई.. बहुत ही धीमे से मैंने दरवाजा खोला... ताकि कोई जाग न जाये.. जाने क्यों मुझे पकड़े जाने का डर लग रहा था.. पता नहीं मेरे मन में चोर अपने आप में ही भयभीत हो उठा... कहीं किसी को पता लग गया तो... कहीं अंकल या मम्मी पापा ने देख लिया तो.. किसी और ने देख लिया तो...!!! अजीब सी उधेड़बुन में मैंने दरवाजे की चिटकनी खोली..
सामने वो खड़ा था... उसके हाथ में कुछ नहीं था... मेरा चेहरा थोड़ा उदास जरूर हुआ पर उसे करीब देख कर फिर भी मन में संतुष्टि थी...
"कहाँ है मेरा तोहफा?" मैंने आंखें बंद कर उसके सामने हाथ बढ़ा दिया...
उसने मेरा हाथ हाथों में भर लिया.. धीरे से मुझे दीवार की ओर सरकाया .... मेरी आँखें तब भी बंद ही थी... हल्की हल्की चलती ठंडी हवाओं से मेरे खुले बाल मेरे गालों को छू कर होंठो से लिपटते जा रहे थे.. चाँद की चाँदनी में हम दोनों अकेले ... तन्हा... एक दूसरे के सामने.. और बेहद करीब थे... मैं उसकी सांसें सुन पा रही थी..
फिर धीरे से वो मेरे और करीब आया...उसने अपने दूसरे हाथ की उंगलियों से मेरे होंठों तक आती जुल्फों को मेरे कान के पीछे कर दिया..
मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था.. अब मुझे उसकी सांसें भी महसूस होने लगी थी.. मैं अपनी आँखें खोलने ही वाली थी.. फिर वो हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी..
हम दोनों का वो पहला चुम्बन.. जो शायद मेरे लिए बयां कर पाना भी बहुत मुश्किल है... शायद एक या फिर दो मिनट ही चला होगा... पर उस खूबसूरत एहसास को लिखना... उफ्फ्फ्फफ्फ़
हमारे चुम्बन के बीच जैसा सब कुछ रुक गया.. हवाएँ... समय... उड़ते बादल.. रात की रानी की महक... सब कुछ थम सा गया था.. और सिर्फ हम दोनों थे उस एक पल में.. एक दूसरे से जुड़े.. एक दूसरे से बंधे...एक दूसरे में खो जाने के लिए... उस एक गर्म चुम्बन से बहार की ठंडक भी गर्मी में बदल गई थी...फिर धीमे से हम दोनों जब अलग हुए.. और मैंने आंखें खोली..
उसने मुझे कहा,"यह था तुम्हारा जन्मदिन का तोहफा..." " जन्म रात बहुत बहुत मुबारक हो... "
कुछ देर तो मैं एकटक खड़ी सोचती रही.. यह क्या हुआ अभी कुछ देर पहले मेरे साथ...?
फिर अचानक उसके शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे,"अन्दर नहीं बुलाओगी... अन्दर नहीं बुलाओगी क्या.. हेल्लो ! मुझे ठण्ड लग रही है..."
मैंने उसे घर के भीतर लिया उसने भी अपनी चप्पल हाथ में ले ली ताकि कोई आवाज़ ना हो..
मैंने चिटकनी लगाई और उसे फुसफुसाते हुए सीढ़ियों से ऊपर जाने का इशारा किया...
वो ऊपर चला गया.. और मैं अपनी ही सोच में डूबी थी.. भावनाओं के भंवर में फंसी .. जिसे शायद प्रेम कहते हैं...स्नानगृह की ओर बढ़ गई.. अपने बाल सँवारे, मुँह-हाथ धोए.. कपड़े बदले और इत्र लगा कर अपने कमरे में गई..
वो फोन की लाइट से मेरे कमरे में भ्रमण कर रहा था.. दीवार पर लगी मेरी तस्वीरें गौर से देख रहा था..
अचानक हुए मेरे आगमन से वो थोड़ा हैरान सा हो गया.. मेरे इत्र की खुशबू ने पूरे कमरे को महका सा दिया था..
मैंने उसे बैठने के लिए कहा..
वो बैठ गया..
एक अजीब सी खामोशी के बीच हमसे कुछ बोले नहीं बन रहा था..
" तुमने मुझे स्कूल में क्यों नहीं विश किया?"
"तुझे क्या लगता है, स्कूल में तुझे मैं ऐसे कर सकता था..?"
"तो तू कोई उपहार नहीं ला सकता था?"
"क्या इससे बेहतर कोई और उपहार हो सकता था तेरे लिए.. तू ही बता..."
"तुझे यह खुराफाती आईडिया कैसे आया.?"
"चाहे खुराफाती भले था.. तुझे अच्छा लगा या नहीं..?"
अब मैं हाँ बोलती तो फंसती, ना बोलती तो झूठ होता.. वो हमेशा ऐसे टेढ़े सवाल करके मुझे फंसाता था..
"मेरी छोड़ तू अपनी बता.." मैंने भी बात घुमाई...
"अपनी क्या बताऊँ... मेरी तो दुनिया तुझ से ही शुरू है और तुझी पे ख़त्म.."
मुझे उसकी हर बात पर शर्म आ रही थी.. वैसे तो वो कई बार मेरे घर आया था.. मेरे कमरे में भी, पर आज कुछ अलग बात थी.. अलग कुछ ख़ास था.. आज वो एक अजनबी सा लग रहा था.. जैसे वो अब दोस्त नहीं रह गया था.. और वो उसकी चोर नज़रें मेरे दिल में गड़ी जा रहीं थी .. और उसका मेरी तस्वीरों को निहारना.. और मुझे देखकर चौंकना.. उसके दिल में जरूर कोई चोर था.. जिसे वो अपनी बातों से छिपा रहा था...
"अच्छा सुन... तूने यही वक़्त क्यों चुना..?"
" क्यूंकि ........" उसके पास कोई जवाब नहीं था..
फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला..." तू सवाल बहुत करती है.. अब अगला सवाल किया तो तेरा मुँह बंद कर दूंगा.."
"अच्छा..!!! करके तो दिखा जरा ....!!!! काट खाऊँगी तुझे..!!!"
" यह बात.. !!!"
वो आगे बड़ा मुझे अपनी बाँहों में खींचते हुए उसने मेरा ज़ोरदार चुम्बन लिया.. काफी देर मेरे होंठ चूस चूस के लाल कर देने के बाद अपना चेहरा हटा के बोला.. " अब करेगी और सवाल .. करेगी अब..??"
"हाँ...करुँगी .. करुँगी.."
उसने फिर मेरे होंठों से अपने होंठ लगा दिए.. मैं भी अब उसके होंठ का मज़ा लेने लगी थी... उसके हाथ मेरी कमर नाप रहे थे.. और मेरे हाथ उसके बाल संवार रहे थे.. हम दोनों आंखें बंद किये.. एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे.. उसकी जीभ अब मेरे होंठों को भिगोने लगी थी... उसकी आँखों में अब भी शरारत थी... होंठों के रसपान के बाद वो मेरी गर्दन की ओर बढ़ गया.. और गर्दन पर तो उसने अपने दांत ही गड़ा दिए.. उसके इस प्रेम पर तो मैं सौ जहाँ लुटा देती... मैंने उसके कानों पर जीभ फिरानी शुरू कर दी.... और कब उसके हाथ मेरी कमर से मेरे स्तनों तक पहुँचकर मेरे स्तन मसलने लगे, मुझे पता ही नहीं चला...
वो बार बार अपने होंठ मेरी टीशर्ट के ऊपर ले जा कर मेरे स्तनों के चूचक चूसता और फिर होंठ चूसता... ऐसा लग रहा था... जैसे होंठों की मिठास से मेरे चुचूकों के दूध को मीठा करके पी रहा हो...!!!
थूक से गीली हुई सफ़ेद टीशर्ट में से भूरे चुचूक अब दिखने लगे थे.. और मैं अब उसे खुद से दूर करने में लगी थी... पर उसकी हर छुअन मुझे अच्छी लग रही थी.. मैं किसी तरह उसकी बलिष्ठ बाँहों से छूटी.. और अलग हो गई... हम दोनों एक दूसरे की आँखों से एक दूसरे का मन पढ़ रहे थे...!!!
पढ़ते रहिए !
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इन्तज़ार


हमारे गाँव में पवन के पिताजी की करियाने की दुकान थी। वह अपने पिताजी की तरह मोटू व अकड़ू था। मेरे पिताजी नगर की नगरपालिका में क्लर्क थे, रोज छः किलोमीटर साइकिल चला कर दफ़्तर जाते और शाम को घर लौटते। पवन के अतिरिक्त हमारे साथ में वह भी खेलती थी- पड़ोस की हमउम्र नाजुक-नरम सी लड़की।
उसके पिताजी शहर के सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। वे भी साइकिल से शहर जाते थे। उनका स्कूल दोपहर में समाप्त हो जाता था तो वे दोपहर ढलने तक गाँव वापस आते थे।
पिताजी नहीं चाहते थे कि मैं पवन के साथ खेलूं। वह ऐसी-ऐसी गालियाँ देता, जिन्हें सुनना भी हमारे यहाँ पाप माना जाता। वैसे भी उसे पढने-लिखने में रुचि नहीं थी, क्योंकि उसे तो बड़े होकर अपने पिताजी की दुकान ही संभालनी थी। लेकिन मेरे पिताजी मुझे पढ़ा-लिखा कर अफ़सर बनाने का सपना संजोए बैठे थे।
मास्टर जी बहुत सीधे-सादे आदमी थे, अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे। वह थी ही प्यार करने लायक। बड़ी प्यारी और बड़ी मोहिनी। मेरे पिताजी तो सारे दिन घर में होते नहीं थे। माँ घर के कामकाज में लगी रहती थीं। तब हम गाँव के ही छोटे से स्कूल में ही पढ़ते थे। स्कूल खत्म होते ही हम तीनों खेल में जुट जाते, तरह-तरह के खेल खेला करते। पवन को गुड्डे-गुडियों के खेल पसंद नहीं थे, ताश-लूडो खेलना हम जानते नहीं थे। तो हम घर-घर खेलते। पवन हमेशा ही घर वाला बनता, वो घर वाली और मैं नौकर। कभी पवन बन्ना बनता, वह बन्नो बनती और मैं पंडित बनता।
पवन किसी खेल का दांव कभी नहीं चुकाता था। खेलता, फिर बस्ता उठाता और चल देता। वह हमेशा उसी की घर वाली या बन्नो बनकर रह जाती। मेरा दांव तो कभी आता ही नहीं था और मैं नौकर या पंडित बनकर रह जाता। मुझे गुस्सा तो बहुत आता, लेकिन पवन इतना अकड़ू था कि उससे लड़ने की हिम्मत मैं कभी जुटा नहीं पाया।
एक दिन हम शादी-शादी खेल रहे थे। हमेशा की तरह पवन बन्ना बना हुआ था और वह बन्नो।
पंडित ने दोनों की शादी की रस्म पूरी कराई ही थी कि पवन अपने घर चल दिया। मैं तिलमिला गया। मैंने हिम्मत जुटाई और चिल्लाया- मेरा बारी देकर जा !
उसने मुझे पलट कर भी नहीं देखा, बस चलते-चलते ही चिल्ला कर बोला- नहीं देता जा..।
उस दिन मैं बदला लेने को आमादा था, इसलिए पूरी ताकत लगा कर कहा- बारी नहीं देगा तो तेरी बन्नो मैं रख लूंगा..
वह फिर भी नहीं मुडा। वैसे ही हवा में हाथ उड़ाता सा बोला- जा रख ले..
मैं रुआंसा हो आया, हाथ-पैर कांपने लगे। तभी वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने अपने कोमल हाथों से मेरे गालों पर ढुलक आए आँसू पोंछे और बोली- कोई बात नहीं, आज से मैं तेरी बन्नो ! खुश हो जा।
मैं शायद खुश हो भी गया था।
धीरे-धीरे हम बड़े हो गए। हमारी पढ़ाई गाँव में जितनी होनी थी, हो गई थी। जैसा कि तय था, पवन अपने पिताजी की दुकान पर बैठने लगा और मेरे पिताजी ने मेरा दाखिला शहर के स्कूल में करवा दिया। मैं रोज सुबह उठता, तैयार होकर भारी बस्ता पीठ पर लाद कर छः किलोमीटर दूर स्कूल के लिए चल पड़ता। जब तक घर वापस आता, सांझ ढलने को होती। मैं पस्त हो जाता, लेकिन पिताजी मेरा हौंसला बढ़ाते रहते, वो मुझसे कहते- तुम्हें तो अफसर बनना है।
मास्टर जी ने अपनी बेटी को शहर के उसी स्कूल में प्रवेश दिला दिया, जिसमें वह पढ़ाते थे। वे उसे अपने साथ साइकिल पर ले जाते और साथ वापस लाते। रास्ता तो एक ही था। मुलाकात भी होती, लेकिन कुछ ऐसे कि मैं धीरे-धीरे पैदल जा रहा होता और मेरे बाजू से मास्टर जी की साइकिल गुजर रही होती। पता नहीं वह मेरी ओर देखती या नहीं, लेकिन मैं उसकी ओर देखने का साहस नहीं जुटा पाता।
हम बड़े होते जा रहे थे। हमारे वयस्क होने के चिह्न उभरने लगे थे। आयु के इस मोड़ पर कभी हमारा सामना होता भी तो मेरे पैर कांपने लग जाते और वह लजा कर भाग जाती।
तब हमारे शहर में कॉलेज नहीं था। पिताजी ने आगे की पढाई के लिए मुझे महानगर में मामा के पास भेज दिया। पीछे मुड़ कर देखने का अवसर नहीं था, फिर भी कभी-कभार मुझे आज से मैं तेरी बन्नो वाली बात याद आती और मन में सिहरन का अनुभव होने लगता।
तीज-त्यौहार पर जब कभी गाँव आना-जाना होता तो आँखें अनायास उसे ढूंढने लगतीं। कभी आमना-सामना होता तो इस स्थिति में कि वह छत पर खड़ी होती और मैं गली में। हम एक-दूसरे को ठीक तरह से देख ही नहीं पाते क्योंकि यदा-कदा जब हमारी आँखें मिलतीं तो पल-दो पल में ही शर्म से झुक जातीं। हमारे संस्कार ही ऐसे थे और ऊपर से बड़े-बुजुर्गो का डर भी बना रहता था।
समय के साथ-साथ आयु में वर्ष जुड़ रहे थे, अतीत धुंधलाने लगा था। मैं वकालत कर रहा था, जज बनने के सपने मेरे मस्तिष्क में अपनी जड़ें गहरी बनाते जा रहे थे।
गर्मी की छुट्टियाँ हुई, हर बार की तरह इस बार भी मैं छुट्टियाँ बिताने गाँव आया। अब माता-पिताजी और घर के अलावा गाँव की अन्य चीजों से पहले जैसा लगाव बाकी नहीं रह गया था। घर पहुँचते ही पता चला कि उसकी शादी होने वाली है। जाने-अनजाने अन्तर्मन में कुछ टूटने की आवाज हुई और मैं यह समझ नहीं पाया कि ऐसा क्यों हुआ था।
उसके यहाँ शादी की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। मुझे भी जिम्मेदार व्यक्ति की तरह काम सौंपे गए थे, लिहाजा मन में खासा उत्साह था। सुबह से रात तक किसी न किसी काम में लगा रहता। धीरे-धीरे शादी का दिन आ गया। गाँव-कस्बे के बड़े-बुजुर्ग, मुखिया तो सुबह से ही आकर जम गए थे। उनके लिए लस्सी-पानी का प्रबंध करते रहना भी बड़ा काम था। ऊपर से साज-सजावट, शाम के भोज की व्यवस्था... दम मारने की फुरसत नहीं मिल पा रही थी।
दिन कब बीत गया, पता नहीं चला। अब तो बारात आने की बेला पास आ रही थी। स्त्रियां सज-संवर चुकी थीं। ऊपर के कमरे में उसे दुल्हन बनाया जा रहा था।
खूब चहल-पहल थी। मैं किन्हीं कामों में व्यस्त था कि तभी उसकी छोटी बहन आई, फुसफुसाते हुए बोली- दीदी आपको ऊपर कमरे में बुला रही है।
मैंने उस निर्देश को भी अन्य कामों की तरह ही लिया और सीधा ऊपर कमरे की ओर बढ़ चला।
कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था और वहाँ उस समय कोई नहीं था। मैं आगे बढ़ा और तनिक सहमते हुए दरवाजा खोला। अंदर वह अकेली थी, लाल रंग की साड़ी और सुनहरे आभूषणों से सजी-संवरी वह एक ज्वाला की तरह लग रही थी। मुझे वह एक अभिसारिका की तरह आकुल व उत्कंठित प्रतीत हुई। जीवन का यह पहला अवसर था, जब मैं सजी-संवरी दुल्हन के इतने पास खड़ा था।
मैं निस्तब्ध था।
वह अचानक मेरे करीब आ गई। अब हम एक-दूसरे की तेज चलती सांसों की आहट सुन पा रहे थे। उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया और बोली- कैसी लग रही है तुम्हारी बन्नो?
मैं चौंका, घबराया और लड़खड़ाते हुए बोला- सुंदर, बहुत सुंदर !
वह तपाक से बोली- तो अपनाया क्यों नहीं?
अपनी बात पूरी करते-करते उसका गला भर आया था।
मतलब? मैंने कहा।
मतलब क्या? भूल गए? मैंने कभी तुमसे वादा किया था कि मैं केवल तुम्हारी बन्नो बन कर रहूँगी। उसकी आवाज में अधीरता थी।
वे तो बचपन की बातें थीं, मैंने कहा।
तो वह बोली- जवानी बचपन से ही निकल कर आती है, आसमान से तो नहीं टपकती। बचपन के वादे जवानी में निभाने चाहिए या नहीं? बोलो?
मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था, चुप रहा।
वह फिर बोल उठी- मैंने तो बहुत प्रतीक्षा की। शायद कभी न कभी तुम कुछ कदम आगे बढ़ाओ, धीरे-धीरे मैं निराश हो गई। क्या करती, मैंने शादी के लिए हाँ कर दी।
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ !
लेकिन मुँह से निकला- अब क्या हो सकता है?
उत्तर में वह बोली- चलो भाग चलते हैं।
"धत्.. ऐसा कुछ नहीं हो सकता।" मेरे मुँह से अनायास ही निकला।
वह तनिक और आगे बढ़ आई और बोली- तुमसे कुछ नहीं हो सकता। पर मुझसे जो हो सकता वह तो मैं करूँगी।
वह मेरे और करीब आ गई और मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लिया।
हमारी सांसें तेज चल रही थीं।
उसकी उत्तेजना में..
तो मेरी घबराहट में।
वह किसी मदोन्मत्त की तरह मेरे आगोश में थी..
अब यह बखान करना तो बेमानी होगा कि उस समय जो कुछ हुआ वह क्या और कैसा था। किस कमबख्त को ऐसे पलों में होश रहता है। लेकिन मेरा पूरा शरीर आंधी में किसी पेड़ से लगे पत्ते की भान्ति कांप रहा था।
कोई देख न ले, यह शाश्वत भय न जाने कितने अवसर चूकने को मजबूर करता है।
मैंने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।
अभी मैं छत से नीचे जाने वाली सीढ़ियों की ओर बढ़ रहा था कि किसी ने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने घबरा कर देखा तो वह भाभी थीं, सगी नहीं, परिवार-खानदान के रिश्ते वाली भाभी।
मेरी हमउम्र थीं और सच कहूँ तो वह हमारे परिवार की रौनक थीं।
मेरा हाथ पकड़े-पकड़े भाभी ने अपने आंचल से मेरे होंठ और गालों को रगड़ कर पौंछ डाला।
मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था और स्तब्ध खड़ा था।
आज पहली बार भाभी ऐसा कुछ करते हुए हंस नहीं रही थीं, वह गंभीर थीं, धीरे से बोलीं- लाली लगी थी, पौंछ दी है। इस हालत में नीचे जाते तो दोनों फांसी पर लटके मिलते।
मैं सिहर उठा। वक्त की नजाकत को समझने में मुझसे भूल हुई थी।
भाभी बोलीं- जाओ, भूल जाओ उसे।
इस वक्त एकाएक अपना कुछ खोने जैसी कसक दिल में चुभती सी महसूस हुई। आँखें नम हो आई।
फिर भी, मैंने खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हुए कहा- वो अब तक बचपन की बातें सहेज कर बैठी है।
भाभी धीरे से बोलीं- होता है..। प्यार तो कच्ची उम्र में ही होता है।
कच्ची उम्र नहीं भाभी..! मैंने कहा- वो सब बचपन की बातें हैं।
वह बोलीं- तुम सचमुच भाग्यवान हो। कोई तुम्हें बचपन से प्यार करता है।
मैंने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए अपने को तनिक व्यवस्थित किया और कहा- बिना सोचे समझे यह कर डाला।
भाभी ने गहरी सांस ली और बोली- जो नासमझी में हो जाए वही प्यार है। सोच-समझ कर तो सौदा किया जाता है।
भाभी जो कुछ भी कह रही थीं वह उनके चिर-परिचित स्वभाव के नितांत विपरीत था।
मुझे उनके स्वर में टीस का आभास हो रहा था, मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने उनसे बिंदास प्रश्न किया- भाभी, आपके साथ भी कुछ ऐसा.. मेरा मतलब, कभी आपने भी किसी से.. मैं प्रश्न पूरा कर पाता उससे पहले भाभी नीचे जाने वाली सीढ़ियों की ओर जा चुकी थीं।
वह सीढ़ियाँ उतरते-उतरते बोलीं- स्त्रियाँ अपने विफल प्यार के किस्से नहीं सुनाया करतीं।
मैं अवाक खड़ा रह गया था।
बाजे की आवाज अब पास आती जा रही थी..


भाभी की ट्यूशन


प्रेषक : समीर रंजन
मेरा नाम समीर है, मैं लखनऊ में रहता हूँ, 27 साल का हूँ ! मैं इससे पहले कई कहानियाँ अन्तर्वासना.कॉम पर लिख चुका हूं।
मैं आज आपको अपनी जिंदगी की सबसे प्यारी घटना बताता हूँ जो आज से कुछ साल पहले गलती से हुई। यह बिल्कुल सच्ची घटना है, चाहे आप विश्वास करें या न करें !
मैं 5 फ़ीट 9 इंच का गोरा और काफी अच्छे व्यक्तित्व वाला हूँ। मेरे पड़ोस में एक भाभी हैं जो इंग्लिश टीचर हैं। वो इतनी सेक्सी दिखती हैं कि उनके बारे में सोच कर ही लण्ड अपनी ऊँचाई पर पहुँच जाता है। उनके बड़े बड़े मम्मे देख कर ही दिल उन्हें मसलने को तड़प जाता है और सबसे बड़ी उनकी गाण्ड ! मैं तो मर ही जाता था जब उनकी गाण्ड को हिलते हुए देखता था। आप उन्हें सेक्स की देवी कह सकते हैं। अब मैं आपको अपनी कहानी की तरफ ले चलता हूँ।
वो इंग्लिश की टीचर हैं, मैं इंग्लिश में थोड़ा कमजोर था तो उन्होंने मेरे मॉम को कहा कि समीर को उनके पास पढ़ने भेज दिया करें !
वैसे वो सिर्फ लड़कियों की ही ट्यूशन लिया करती थी। जब मेरी मॉम ने मुझे बताया कि भाभी ने मुझे ट्यूशन पढ़ने के लिए अपने आप कहा है तो मैं हैरान हो गया। पर मैं खुश था कि कम से कम मैं उनके साथ हर रोज बैठ तो सकूँगा।
फिर मैं रोज उनके यहाँ ट्यूशन पढ़ने जाने लगा। मैं पढ़ाई करते वक़्त कई वार उनके गहरे गले के कमीज़ में से उनके बड़े बड़े मम्मों को देखता था पर उन्हें पता नहीं चलने देता था। उनकी और मेरी काफी पटने लगी थी, हम काफी हंसी-मजाक भी करते थे।
एक दिन ऐसे ही मजाक मजाक में उन्होंने पूछ लिया- क्या तुम्हारी कोई गर्ल फ्रेंड है?
मैंने कहा- हाँ बहुत सारी हैं।
वो बोली- नहीं, जो फ्रेंड से भी ज्यादा हो?
मैंने कहा- मैं समझा नहीं?
वो बोली- मेरा मतलब, जिसे तुम प्यार करते हो।
मैंने कहा- नहीं, ऐसी कोई नहीं है।
वो बोली- नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, तेरे जैसे लड़कों को तो लड़कियाँ ढूंढती रहती हैं।
मैंने कहा- नहीं, ऐसी कोई नहीं है, सच बोल रहा हूँ !
तब वो मेज पर आगे झुक कर बैठ गई और बोली- कभी तुमने किसी को चाहा है?
मैंने कहा- मेरे चाहने से क्या होता है?
वो बोली- अगर तुम किसी को चाहते हो तो उसे बता देना चाहिए।
मैंने कहा- उससे क्या होगा?
वो बोली- अगर वो भी तुम्हें चाहती हो और तुम्हारी तरह तुम्हें भी बता न पा रही हो तो?
फिर वो बोली- अगर उसकी भी हाँ होगी तो दोनों चाहने वाले एक दूसरे से मिल जायेंगे।
मैंने सोचा कि यह अच्छा मौका है, मैंने भाभी का हाथ पकड़ा और कहा- भाभी मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ !
वो डर गई और मुझे अपने घर जाने को बोलने लगी।
मैंने कहा- मैं तो मजाक कर रहा था !
तब उनको राहत महसूस हुई। फिर इधर उधर की बातें हुई और मैं घर आ गया।
मैंने रात भर भाभी के बारे में सोच सोच कर दो बार मुठ मारी।
अगले दिन जब मैं उनके घर ट्यूशन में पहुंचा तो उस दिन वो साड़ी पहने थी, स्लीवलेस ब्लाऊज़ में वो बहुत सेक्सी लग रही थी, दिल कर रहा था कि उसके होंठों को खा जाऊँ !
वो मुझे देख कर मुस्कुराई और बोली- आओ समीर, बैठो !
मैंने कहा- आप कहीं जा रही हैं क्या?
वो बोली- नहीं बस ऐसे ही दिल किया, इसलिए साड़ी बांध ली।
मैंने कहा- आप बहुत सुन्दर लग रही हैं इस साड़ी में !
फिर मैंने अपनी किताब निकाली तो उन्होंने उसे पकड़ कर बंद कर दिया और बोली- आज बातें करते हैं, पढ़ाई कल करेंगे !
मैंने कहा- ठीक है !
इधर मेरा लण्ड खड़ा हो रहा था उसकी ऐसी अदाएँ देख कर !
यह उसने महसूस भी कर लिया था। वो मुझे देख कर मुस्कुराई और बोली- समीर, क्या मैं तुम्हें सच में अच्छी लगती हूँ?
मैंने कहा- हाँ भाभी !
वो बोली- मेरा नाम दीपिका है, तुम मुझे अब इसी नाम से बुलाओगे। अब हम दोस्त हैं।
ऐसा कह कर उन्होंने मेरे हाथ पर हाथ रख दिया। इतने से ही मुझे जोश आ गया, मैंने उसके चेहरे को पकड़ कर उसके मोटे और सुन्दर होंठों को अपने मुँह में लेकर जबरदस्त तरीके से चूसने लगा। उन्होंने मुझसे छुट कर कहा- दरवाजा खुला है, कोई देख लेगा।
मैंने उठ कर दरवाजा बंद किया और मैं फिर उनको चूमने लगा। हम पागलों की तरह एक-दूसरे को चूम रहे थे। मेरे हाथ उसके मस्त कूल्हों को दबा रहे थे। मैं इतने जोश में था कि उसके ब्लाउज के हुक भी तोड़ डाले। उसने काले रंग की पारभासी ब्रा पहनी हुई थी जिसमें से उसके बड़े बड़े मम्में लगभग बाहर ही दिख रहे थे। मैंने जोर लगा कर उसकी ब्रा को भी फाड़ डाला।
वो भी मदहोश थी और मेरी छाती और पैंट के ऊपर से ही मेरे लण्ड को मसल रही थी।
मैंने उसकी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी और पेटिकोट को भी उतार दिया। उसने मेरी पैंट और शर्ट भी उतार दी। अब वो सिर्फ पैंटी में थी जिस में से उसकी चूत भी बाहर झलक रही थी और मैं अंडरवीयर में था जो एक तम्बू सा लग रहा था।
तब वो मुझे लेकर अपने बैडरूम में चली गई। वहाँ पर उसने मेरे अंडरवीयर को उतार दिया। जब उसने मेरे लण्ड को देखा तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, वो तो उसे पागलों की तरह चाटने लगी, वो उसे लॉलीपोप की तरह मुँह में चूस रही थी।
पहली बार किसी ने इतनी अच्छी तरह मेरे लण्ड को मुँह में लेकर चूसा था, मैं तो जैसे स्वर्ग में था।
मैं उसके सर को पकड़ कर जोर-जोर से हिलाने लगा। लगभग दस मिनट बाद मैंने उसकी चूत में ऊँगली डाली, वो बहुत ही गर्म थी, मेरे ऐसा करते ही उसके मुँह से सिसकी निकली- आह ह्ह्ह्हः तेज करो जानू ! मजा आ रहा है ! मैं अपनी अब दो उंगलियाँ तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा। वो ऊओह्ह्ह वगैरह आवाजें मुँह से निकालने लगी। उसकी आँखें बंद हो गई थी।
फिर हम लोग 69 की अवस्था में आ गए, मैंने उसकी चूत को चाटना शुरू किया तो वो तड़प उठी- नहीं समीर ! नहीं ! प्लीज़ अह आआ औऊम्म्म्म ! मैं मर जाऊँगी !
और वो मेरे लण्ड को मुँह में लेकर चूसने लगी। बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी।
मैंने उससे कहा- अपनी चूत को एकदम साफ़ कर लेना, मुझे तुम्हारी चूत एकदम साफ देखनी है।
वो बोली- जब दिल करे, तुम अपने हाथ से इसे साफ़ कर देना, अब तो यह तुम्हारी ही है !
और मुस्कुराने लगी। मैंने उसकी गाण्ड में भी एक उंगली डाल दी। वो दर्द से चिंहुक पड़ी, बोली- ऐसा मत करो प्लीज़ ! दर्द होता है।
मैंने हंस कर कहा- दर्द में ही तो मज़ा है। अब यह भी तो अब मेरा ही हुआ न?
वो बोली- अब तो सब कुछ तुम्हारा है !
और हम लोग लगभग 15 मिनट तक एक दूसरे को इसी तरह मज़े देते रहे।
इतने में उसकी चूत एक बार पानी भी छोड़ गई। फिर मैंने उसे सीधा कर के लिटाया और उसके होंठो और स्तनों को चूमने लगा। उसके चूचे लाल हो गये थे।
वो बोली- समीर, अब मुझसे रहा नहीं जा रहा है, प्लीज़ कुछ करो, मैं मर जाऊँगी।
फिर मैंने उसकी गाड के नीचे एक तकिया लगाया तो उसकी चूत एकदम ऊपर उठ गई। मैंने प्यार से उस पर हाथ फेरा, वो आ आआ अह हह्ह करने लगी, छोड़ो मुझे जल्दी प्लीज़ छोड़ो आआआह
मैं भी पूरा गर्म हो चुका था, मेरे बदन का रोया-रोया खड़ा हो गया था। फिर मैंने अपने लण्ड को उसकी चूत पर रखा और उसने अपनी टांगों को फैला लिया। उसकी चूत काफी कसी हुई लग रही थी। फिर मैंने एक जोर का झटका लगाया, उसके मुँह से चीख निकल गई- आअह्ह्ह्हाअ ! मर गई ! धीरे करो बेटे ! मुफ़्त का माल समझ कर टूट पड़े?
मैंने उसके चूचों को मसलना शुरु कर दिया और उसके होंठों को अपने मुंह में ले लिया। वो थोड़ी देर में शांत हो गई।
फिर मैंने एक और झटका मारा, मेरा आधे से अधिक लण्ड उसकी चूत में जा चुका था। वो दर्द से मचल उठी- आअ ह्ह्ह्ह ऊऊ ह्ह्ह्ह ! छोड़ ! दो बाहर निकालो इसे ! हहह !
मैं जोश में था और मैंने झटके देने शुरू कर दिए। लण्ड के अन्दर-बाहर होने से उसे थोड़ी राहत मिलनी शुरू हुई और वो भी मज़ा लेने लगी- आह आह्ह ! धीरे करो जानू ! अ आः मार डालो मुझे !
और फिर मैंने एक जोरदार झटका और मारा, और मेरा पूरा लण्ड उसकी चूत में फिट हो गया था।
मैं उसे तेजी से चोद रहा था, वो भी नीचे से गाण्ड उछाल उछाल कर मेरा साथ दे रही थी। तभी उसकी गति तेज़ हो गई और वो झड़ गई।
मैं अभी भी उसे चोदे जा रहा था, वो फिर गर्म हो गई और मेरा साथ देने लगी।
दस मिनट बाद वो फिर झड़ गई। मैं भी मस्ती में आ चुका था, मैंने अपनी गति और तेज़ कर दी और वो भी आआआ स्स स्स्साह ! जानू आई लव यू ! आआअह्ह्ह करने लगी और बोली- करते रहो, मेरे जानू करते रहो !
और उसने अपने दोनों पैरों से मेरी कमर को पूरी तरह से जकड़ लिया और एक जोर के झटके के साथ में वो दोबारा झड़ गई।
और मेरे होंठों पर अपने होंठ को रख कर चुम्बन करने लगी।
मेरा लण्ड भी अब आखिरी चरण पर आ चुका था। मैं और जोर से उसकी चूत में अपना लण्ड अन्दर-बाहर करने लगा और जोर जोर से झटके मारने लगा और फिर मैं भी झड़ने लगा।
मैं उसके चूत में ही झड़ गया, उसकी चूत मेरे वीर्य से भर गई।
मैं दो मिनट तक तो ऐसे ही उसके ऊपर लेटा रहा फिर उसकी बगल में आकर लेट गया और वो मेरे कंधे पर सर रख कर लेट गई।
उसका नंगा मुलायम शरीर सच में बहुत खूबसूरत लग रहा था।
आपको मेरी यह खूबसूरत आपबीती कैसी लगी, आप अपनी राय जरूर बताएँ।
ranjansameer@in.com

आकर्षण- 7


लेखिका : वृंदा
बीच बीच में वो मुझे प्रेम भरे चुम्बन देता... धीरे धीरे उसके धक्के तेज़ होने लगे ... चूत में मुझे खिंचाव महसूस होने लगा... खुद ब खुद मैं उसके धक्कों से ताल से ताल मिला कर... उसका ज्यादा से ज्यादा लण्ड अपने भीतर लेने की कोशिश करने लगी... मेरी कोमल काया, उसके पसीने से भरे बलिष्ठ शरीर के नीचे दबी हुई कसमसा रही थी.. आनन्द अब अपनी चरम सीमा तक पहुँच रहा था..
एक झटके से जाने क्या हुआ मुझे अपनी दोनों जांघों के बीच कुछ गर्म-गर्म रिसता हुआ सा महसूस हुआ...
... मेरे मुँह से आनन्द भरी आहें निकलने लगी... बंद आँखें जब खुली तो वो मेरे ऊपर था और लम्बी लम्बी सांसें ले रहा था...
उसकी गर्म-गर्म सांसें मेरे पसीने से गीले बदन को ठंडक पहुँचा रहीं थी...
मैंने उसे उसकी गर्दन पर एक चुम्बन किया... और कुछ देर हम उसी तरह लेटे रहे...
कुछ देर बाद .. सामान्य अवस्था में आने पर वेदांत मुझ पर से हट कर मेरे साथ में लेट गया...
हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और जोर जोर से हंसने लगे... यह सोचकर कि यह क्या हो गया.. एक चुम्बन ने क्या कर दिया... या फिर शायद यह यौवन ही था जिसने यह सब करा दिया...
मैं उसकी ओर थोड़ी टेढ़ी होकर लेट गई.. और उससे अपने प्यार का इजहार किया...
" वेदांत, एक बात कहूँ...?"
"फिर से करने का इरादा है क्या...?"
"नहीं वो... मतलब हाँ.. मेरा मतलब .. नहीं..." अचानक ही मुझे शब्दावली में शब्द कम होते महसूस हुए।
"क्या नहीं.. हाँ.."
मैंने आंखें बंद कर ली और कह डाला,"आई लव यू !"
और उसने बहुत ही सहजता से जवाब दिया,"मैं भी !"
और इस बार मैंने पहला कदम उठाया.. और उसे एक चुम्बन दिया.. मैं बहुत खुश थी.. कम से कम मैंने अपना सब उसे सौंपा, जिससे मैं प्रेम करती हूँ और जो मुझ से प्रेम करता है.. अब आगे कुछ भी हो.. मुझे किसी बात का डर नहीं था... मुझे किसी बात की परवाह नहीं थी.. उसे ही अपनी मंजिल मान चुकी थी मैं...
कुछ देर नग्न अवस्था में एक दूसरे की बाँहों में हमें वक़्त का पता ही नहीं चला.. सुबह के पांच बज गए थे.. मेरी माँ के उठने का समय हो गया था..
मैंने जल्द से जल्द उसे कपड़े पहन घर लौट जाने को कहा.. आखिर उसे और मुझे दोनों को ही इसी समाज में रहना था.. हमने भले ही सब कुछ प्रेम में किया हो... और भले ही यह सब हमारे निस्वार्थ प्रेम में गलत ना हो.. पर दुनिया इसको गलत ही मानती है.. शादी से पहले.. तो... हमारी मिसाल देकर कहीं लोग अपनी लड़कियों को पढ़ने भेजना बंद ना कर दें..
उसने भी फटाफट कपडे पहने और उसी तरह चप्पल हाथ में लिए वो चुपके से घर चला गया..
उसके जाने के बाद मुझे नींद ही नहीं आई... सोचते सोचते थकान के कारण कब आँख बंद हुई पता ही नहीं चला...
फिर सुबह आठ बजे का अलार्म बजा... आँख खुली तो सब कुछ ऐसा लगा जैसे कुछ हुआ ना हो.. जैसे एक सपना हो.. मैंने फोन उठा कर देखा.. उसमें कोई मैसेज नहीं था.. चादर भी सही सलामत थी.. खिड़की पर पर्दा डाला था.... जहाँ तक मुझे याद था रात को चादर पर काफी सिलवटें पड़ी थी.. थोड़ी गीली भी हुई थी... मेरे कपड़े भी वो नहीं थे जो मैंने रात को वेदांत के सामने पहने थे.. सब कुछ उल्टा पुल्टा था...रात में खिड़की खुली थी.. और अब पर्दा... सोच सोच के मेरा दिमाग फटने लगा था...
तभी माँ आई.. और तैयार होने के लिए मुझ पर चिल्लाने लगी..
"तुझे स्कूल नहीं जाना.. जा अब नहा भी ले.. पंडित बुलवाऊँ क्या..??"
मैं अपनी ही उधेड़बुन में खोई थी.. स्नानघर में जाकर जब कपड़े उतारे तो कोई दाग नहीं.. कोई निशाँ नहीं... सब कुछ रात से पहले जैसा ही था... बस कच्छी थोड़ी गीली थी.. तब समझ में आया..
कि रात को जो कुछ हुआ सिर्फ एक सपना था...
और उसी उत्तेजक स्वप्न के कारण ही मेरी कच्छी गीली थी...
नहाने के बाद खुद को शीशे में देख कर मैं अपने ही यौवन पर इतराने लगी.. कि शायद यह सपना कभी सच हो जाये... गीले बालों को अपने गीले बदन पर झटक कर कामोत्तेजना में अकारण ही मैं अपनी गोलाइयाँ छूने लगी...
मेरी तन्द्रा तो तब टूटी जब दरवाजे पर माँ जल्दी बाहर आने के लिए ख़टखटाने लगी..
"सो गई क्या अन्दर ही...? हे भगवान् क्या होगा इस आलस की मारी का.." बडबडाते हुए माँ चली गयीं तो में तौलिया लपेट कर बाहर आई.. और आज मैंने सोच लिया था कि आज में बाल खोल कर स्कूल जाऊँगी...
कपडे पहन तैयार होने के बाद जब खुद को मैं आईने में देखने लगी तो कुछ कमी लग रही थी.. आज मैंने पहली बार काजल लगाया .. फिर स्कर्ट को थोड़ा और ऊपर खींचा.. ताकि टांगें थोड़ी और दिखें और वेदांत का ध्यान मुझ पर जाये..!!! मोज़े पैर के टखनों तक गिरा दिए.. शर्ट के ऊपर के दो बटन खोल टी थोड़ी ढीली कर ली.. और बस तैयार स्कूल जाने को.. बस्ता उठाया.. माँ से लंच लिया.. और स्टैंड पर जा पहुँची..
वेदांत तब तक नहीं आया था.. मैं बस से ज्यादा वेदांत का इंतज़ार कर रही थी...
वो आया.. पर उसने मुझ पर कोई ध्यान ही नहीं दिया... उसने मुझे जन्मदिन की बधाई दी .. और देर से बधाई देने के लिए माफ़ी मांगी.. हम स्कूल पहुँच गए.. मेरा तीसरा पीरियड खाली था.. मैं उसकी क्लास में जा पहुंची और उसकी अध्यापिका के पास जाकर बोली- वेदांत को मिस मोनिका बुला रहीं हैं...!!!
वो मेरे साथ बाहर आया.. मैं उसका हाथ पकड़ हॉल की तरफ ले गई..!!!
"अरे कहाँ जा रही है.... मोनिका मैम ने बुलाया है ना.."
"किसी ने नहीं बुलाया .. तू चल तो.."
वहाँ पहुँचने के बाद उसने झटके से हाथ छुड़ा कर खीजते हुए कहा.." क्या चाहती है..?"
मैंने उदास सा चेहरा बना के कहा,"मैं तो बस तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ.."
"दूसरी तरफ मुख फेर के उसने कहा,"बोलो !"
" आज तुम्हें कुछ अलग नहीं लगा मुझमें..??, मुझे कल तुमने बधाई भी नहीं दी.. भूल गए क्या अपनी बचपन की दोस्त को..??"
"ये फालतू सवाल पूछने तुम मुझे यहाँ लाई हो...?.. और किस बचपन की दोस्ती का छलावा दे रही हो.. तुम तो वो वृंदा हो ही नहीं जो मेरी दोस्त थी..!!! और यह सब क्या तरीका है वृंदा..?"
"बताओ न आज तुम्हें मुझमें कुछ अलग नहीं लगा क्या..??"
" क्या नया..?? हाँ, यह तुम्हारे शर्ट से झांकती तुम्हारी छाती... तुम्हारी घुटने से ऊपर हुई स्कर्ट में दिखती तुम्हारी जांघें ... या फिर तुम्हारे मौज़े .. क्या देखूँ..?"
"भड़क क्यों रहे हो..?"
"तुम दिखाना क्या चाहती हो मुझे.. अपना गोरा जिस्म..अपने स्तन .. या अपनी टांगें.. कपड़े खोलने इज्ज़त आती नहीं, जाती है...वृंदा !"
मेरा सर शर्म से झुक गया.. पर उसका बोलना जारी रहा..
"नहीं नहीं ! ऐसा करो.. पूरी शर्ट खोल लो.. और यह स्कर्ट पहनने की भी क्या जरूरत है उतार दो इसे भी..."
बस अब आँखों में आँसू आ चुके थे...पर वो बिना साँस लिए मुझ पर चिल्लाये जा रहा था...
"और क्या सोचती हो.. मैं तुम्हारी इन हरकतों को सराहूँ .. वो न कमीने चूतिये लोग होते हैं जो उतरती इज्जत पर खुश होते हैं.. तुझसे ऐसी उम्मीद नहीं रखता हूँ.. स्कूल में कितनी लडकियाँ है.. सब ऐसा करती है पर.. मुझे किसी और की कोई परवाह नहीं, तू मेरी दोस्त है.. तेरे से बचपन का प्रेम है.. इसीलिए तुझे कह रहा हूँ.. और आज के बाद मुझे यह सब दिखा तो मुझसे बात करने हिम्मत करने से पहले सौ बार सोच लियो... जिस दिन फिर कुछ ऐसा हुआ मेरी दोस्ती हमेशा के लिए खो देगी तू... और मुझे भी..."
मैं उसी समय कहना चाहती थी कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ.. पर शायद वो समय सही नहीं था...
"अब रो क्यों रही है.. टोयलेट जा और ठीक कर खुद को.." उसने मुझे प्यार से गले लगाया सर पर हाथ फिराया.. "चल बस अब चुप हो जा.. समझा कर यार ! अब तू बड़ी हो गई है और मैं भी.. तुझे पता है वो रश्मि ने क्या किया एक दिन.. गेम्स के पीरियड में मुझे क्लास में ले जाकर अपनी शर्ट मेरे सामने उतार कर बोली कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ....!!!
मुझे तो समझ नहीं आता.. युवाओं का कैसा प्यार है यह... यूँ तो प्यार नजरों से शुरू हो दिल में उतरता है.. पर आजकल तो प्यार को सिर्फ जिस्मानी मिलन का रूप दे दिया है...
उसकी रश्मि वाली बात सुन कर मुझे उसकी कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी ... मन ही मन मैं रश्मि को कोस रही थी.. उसके कारण आज मेरा इज़हार फिर अधूरा रह गया... उसकी वासना की वजह से मेरे निस्वार्थ प्रेम की बलि चढ़ रही थी... और मैं कुछ नहीं कर पा रही थी... पर मन ही मन रश्मि को सबक सिखाने का फैसला ले चुकी थी.. पर फिलहाल के लिए उसका उफनता गुस्सा देख मैं बाथरूम जाकर खुद को ठीक कर आई... तब तक वो भी अपनी क्लास में जा बैठा ...
पर अब मन में सोच लिया था कि.. दोस्ती को दोस्ती तक रखूँ तो ही अच्छा.. ऐसा न हो कि प्रेम की राहों में मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त को भी न खो दूँ... साथ ही साथ मेरे मन में एक और बात थी जिसका जवाब मुझे ढूंढे नहीं मिल रहा था... वो था उसका उसकी उम्र में इतनी बड़ी सोच रखना.. और किसी भी लड़की से आकर्षित न होना... एक लड़की जो उसके सामने अपने कपड़े तक उतारने को तैयार थी.. उसने उसे क्या कहा होगा.. या फिर क्या कुछ किया होगा..?? मैं अजीब से प्रश्नों में फंसती चली जा रही थी.. पर उत्तर नहीं मिल रहे थे ...क्या वो जैसा मुझे दिख रहा था वैसा ही था... या फिर वो सर्फ मेरे साथ ही ऐसा था.. ?? जिस तरह मुझे उम्र के इस पड़ाव पर उससे आकर्षण हुआ .. क्या उसे नहीं हुआ होगा.. भले मुझसे नहीं किसी और से सही... जब रश्मि ने उसके सामने अपना वक्ष- प्रदर्शन किया क्या उसका मन नहीं किया उन्हें छूने का .. पकड़ने का, दबाने का.. या चाटने का काटने का.. ??
यह कैसा यौवन है उसका.. ??? कहीं ऐसा तो नहीं कि शायद उसे लड़कियाँ पसंद ही ना हों..!!!
खैर सवाल चाहे जो भी थे... पर मैं उससे कभी अपने मन की बात नहीं कह सकी.. बाद में उसे साइकिल मिल गई और मैं तब भी बस से ही स्कूल जाती थी.. धीरे धीरे हम दोनों के बीच की नजदीकियाँ दूरियों में बदल गई.. शाम को मिलने का समय... ट्यूशन में बदल गया.. पर एक बात अच्छी हुई.. उसने भी स्नातिकी दे लिए विज्ञान शाखा ली और मैंने भी..
हम दोनों साथ में एक ही कक्षा में पढ़ते जरूर थे.. पर कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि उसकी तरफ से मुझे लगा हो कि यह दोस्ती से कुछ बढ़कर है... जो भी था केवल एक तरफा था.. पर मुझे इस बात का कभी दुःख नहीं था न ही है कि ..उसने कभी मुझे प्रेम नहीं किया.. भगवान् ने मुझे उसकी दोस्ती से नवाज़ा ... मैं इतने में ही खुश थी... सुखी थी...
बाद में उसे एक लड़की पसंद भी आई थी.. उसने मुझसे उसकी बात भी की.. और पहली बार तब मुझे लगा कि उसके अंतर्मन में भी भावनाएँ हैं जिन्हें प्रेम कहते हैं...
हालाँकि उसकी पसंद कुछ ख़ास तो नहीं थी.. पर जरूर उसमें कोई बात तो थी.. जो वेदांत ने उसे पसंद किया था.. मैंने जी जान से कोशिश की, कि वेदांत के मन की बात उस लड़की को कह सकूँ.. पर शायद भगवान् को यही मंज़ूर था.. जिस तरह पहले उसने मेरा दिल तोड़ा था उसका भी टूटा... उस लड़की ने उसे साफ़ साफ़ कह दिया कि इस उम्र में भले ही एक आकर्षण मात्र.. प्यार सी अनुभूति देता है.. पर प्यार नहीं होता.. प्रेम एक दैविक शक्ति है... और इस शक्ति से ही इस जीवन ओर सरे विश्व का निर्माण हुआ है...
उसकी जलेबी सी बातें सुनकर एक बार तो मेरा भी सर घूम गया था...एक बार तो मुझे भी लगा कि कोई साध्वी टकर गई..
पर कुछ भी हो प्रेम नाम का शब्द उसकी शब्दावली में नहीं था.. ऐसे में वेदांत का दिल टूट गया.. पर आखिरकार वेदांत के पास एक कन्धा तो था जिस पर सर रख वो अपने दुःख बाँट सकता था ... वो थी मैं.. पर मेरे समय में तो मेरे पास कोई नहीं था... जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ.. दिल का हाल बाँट सकूँ..
फ़िर वो अमरीका चला गया और मैं यहीं रह गई.. हम दोनों आज भी संपर्क में हैं.. पर दोस्तों की तरह..
मैंने वेदांत के लिए अपने प्रेम को मन के सौ तालों के भीतर बंद कर दिया है.. हम आज भी सुख दुःख बाँटते हैं.. कंप्यूटर पर आमने सामने बैठ बातें करते हैं.. वो अब वहाँ पीने लगा है...शायद दो चार अन्ग्रेज़नों के साथ हमबिस्तर भी हो चुका है पर मैं आज भी उसे चाहती हूँ.. पर उसकी चाहत की इच्छा रखना गलत होगा..... उसके बाहर जाने से पहले हमारे बीच कुछ हुआ जरूर था पर वो इतना नहीं था कि जिसे प्रेम का नाम दिया जाये.. वो कहानी फिर कभी...
पहले मेरे स्वप्न केवल वेदान्त तक ही सीमित थे.. पर धीरे धीरे ये बदलते बदलते कल्पनाओं से परे हो गए.. आपको आगे भी अपने सपनों से अवगत कराती रहूँगी..
आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा..
वृंदा
arpitas.1987@gmail.com